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COP17 चर्चाएं वैश्विक ₹41.5 लाख करोड़ प्रकृति-हानिकारक सब्सिडी को संबोधित करती हैं

By Arth Vani Desk · 2026-10-14

दुनिया भर की सरकारें सालाना अनुमानित ₹41.5 लाख करोड़ ($500 बिलियन) उन सब्सिडियों पर खर्च करती हैं जो प्रकृति के लिए हानिकारक हैं। COP17 जैसी वैश्विक चर्चाएं इन भारी भरकम निधियों को पर्यावरण के अनुकूल गतिविधियों की ओर मोड़ने पर केंद्रित हैं।

Key takeaways

दुनिया भर की सरकारें सालाना अनुमानित ₹41.5 लाख करोड़ उन सब्सिडियों पर खर्च कर रही हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं। यह पर्याप्त वित्तीय सहायता, जो $500 बिलियन के बराबर है, आगामी COP17 शिखर सम्मेलन सहित अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चर्चा का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन रही है।

प्रकृति-हानिकारक सब्सिडी सरकारों द्वारा प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता या प्रोत्साहन हैं, जो अक्सर अनजाने में, ऐसे गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं जो पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और जलवायु स्थिरता के लिए हानिकारक हैं। इनमें जीवाश्म ईंधन और अस्थिर कृषि से लेकर अत्यधिक मछली पकड़ने और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली औद्योगिक प्रथाओं तक का समर्थन शामिल हो सकता है। जबकि कई सब्सिडियों के पीछे का इरादा आर्थिक क्षेत्रों का समर्थन करना या सार्वजनिक कल्याण सुनिश्चित करना हो सकता है, उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव तेजी से स्पष्ट और महंगे होते जा रहे हैं।

₹41.5 लाख करोड़ का यह चौंकाने वाला आंकड़ा दुनिया भर के नीति निर्माताओं और पर्यावरणविदों के सामने चुनौती की व्यापकता को उजागर करता है। यह राशि वैश्विक आर्थिक गतिविधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दर्शाती है, और इसके पुनर्निर्देशन से संरक्षण, जलवायु कार्रवाई और टिकाऊ अर्थव्यवस्थाओं की ओर संक्रमण के लिए पर्याप्त संसाधनों को खोला जा सकता है। ऐसी सब्सिडियों का लगातार अस्तित्व जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान से संबंधित सहित वैश्विक पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरा करने के प्रयासों को विफल कर सकता है।

यह सवाल कि क्या COP17 जैसे वैश्विक मंच सरकारों को इन प्रकृति-हानिकारक सब्सिडियों को मोड़ने के लिए प्रभावी ढंग से प्रेरित कर सकते हैं, टिकाऊ विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए केंद्रीय है। COP (कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज) की बैठकें महत्वपूर्ण मंच हैं जहाँ पर्यावरण संरक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते किए जाते हैं और प्रगति की समीक्षा की जाती है। इस मुद्दे को सामने लाकर, ये सम्मेलन सदस्य देशों से अपनी सब्सिडी नीतियों में सुधार के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रतिबद्धता को बढ़ावा देना चाहते हैं।

इन निधियों को पुनर्निर्देशित करने में नीति सुधार की एक जटिल प्रक्रिया शामिल है, जिसके लिए सरकारों को मौजूदा सब्सिडियों की पहचान और मूल्यांकन करना, उनके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करना और वैकल्पिक सहायता तंत्र तैयार करना होगा। ऐसे सुधार उन प्रथाओं को बढ़ावा दे सकते हैं जो पारिस्थितिक बहाली, टिकाऊ भूमि उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा और संसाधन दक्षता का समर्थन करती हैं। भारतीय खुदरा पाठकों के लिए, ये वैश्विक चर्चाएं प्रासंगिक हैं क्योंकि वे भविष्य की सरकारी नीतियों, हरित क्षेत्रों में निवेश के अवसरों और देश के भीतर पर्यावरण संरक्षण प्रयासों की समग्र दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।

अंततः, COP17 और इसी तरह के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए चुनौती इन बड़े पैमाने पर प्रकृति-हानिकारक सब्सिडियों के बारे में जागरूकता को ठोस कार्य योजनाओं में बदलना है। इन निधियों को पुनर्निर्देशित करने में सफलता एक अधिक टिकाऊ और लचीले भविष्य की ओर वैश्विक संक्रमण को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिससे पर्यावरण और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता दोनों को लाभ होगा।

यह रिपोर्ट केवल सूचना के उद्देश्यों के लिए है और इसे वित्तीय या निवेश सलाह नहीं माना जाना चाहिए।

Frequently asked questions

प्रकृति-हानिकारक सब्सिडी क्या हैं?

प्रकृति-हानिकारक सब्सिडी सरकारों द्वारा प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता या प्रोत्साहन हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण के लिए हानिकारक गतिविधियों का समर्थन करती हैं, जैसे जीवाश्म ईंधन उत्पादन, अस्थिर खेती, या विनाशकारी मछली पकड़ना।

विश्व स्तर पर प्रकृति-हानिकारक सब्सिडियों में कितना पैसा शामिल है?

विश्व स्तर पर, सरकारें सालाना ₹41.5 लाख करोड़, या $500 बिलियन, उन सब्सिडियों पर खर्च करती हैं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाती हैं।

इन सब्सिडियों को संबोधित करने में COP17 की क्या भूमिका है?

COP17 एक अंतर्राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करता है जहाँ सरकारें और हितधारक वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा करते हैं, जिसमें प्रकृति-हानिकारक सब्सिडियों का पुनर्निर्देशन भी शामिल है, जिसका उद्देश्य अधिक टिकाऊ वित्तीय प्रथाओं की दिशा में सहयोग और प्रतिबद्धता को बढ़ावा देना है।

Source: GNews Govt Schemes
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