US Fed की दरें 2027 तक रह सकती हैं ऊंची: आपकी EMI और शेयरों के लिए इसके क्या हैं मायने
अमेरिका में उम्मीद से अधिक मजबूत रोजगार वृद्धि के बाद गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती के अपने अनुमान को 2027 तक टाल दिया है। इस 'हायर-फॉर-लॉन्गर' (लंबे समय तक ऊंची दरें) रुख से भारतीय शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बने रहने और RBI द्वारा ब्याज दरें कम करने की योजनाओं में देरी होने की संभावना है।
अमेरिका में उम्मीद से अधिक मजबूत रोजगार वृद्धि के बाद गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती के अपने अनुमान को 2027 तक टाल दिया है। इस 'हायर-फॉर-लॉन्गर' (लंबे समय तक ऊंची दरें) रुख से भारतीय शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बने रहने और RBI द्वारा ब्याज दरें कम करने की योजनाओं में देरी होने की संभावना है।
भारतीय निवेशकों और घर खरीदारों को सस्ते कर्ज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। वैश्विक निवेश दिग्गज गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति पर अपने दृष्टिकोण को संशोधित किया है, जिसमें भविष्यवाणी की गई है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक अब 2026 तक ब्याज दरों को उनके वर्तमान स्तर पर बनाए रखेगा, और पहली कटौती 2027 तक नहीं होगी।
भारत के लिए अमेरिकी देरी क्यों मायने रखती है
उम्मीदों में यह बदलाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आश्चर्यजनक रूप से लचीले होने के कारण आया है। हालिया पेरोल डेटा से पता चलता है कि रोजगार की वृद्धि मजबूत बनी हुई है, जो संकेत देती है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी से काफी दूर है। हालांकि यह वैश्विक विकास के लिए अच्छी खबर है, लेकिन यह फेडरल रिजर्व के लिए एक चुनौती पैदा करता है, जो उधार लेने की लागत कम करने से पहले मुद्रास्फीति (महंगाई) को काफी कम होते देखना चाहता है।
भारतीय खुदरा निवेशकों के लिए, इस वैश्विक घटनाक्रम के दो मुख्य घरेलू प्रभाव होंगे:
- FII आउटफ्लो: जब अमेरिकी ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो वैश्विक निवेशक अक्सर भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश करते हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा यह निरंतर बिकवाली भारतीय शेयर सूचकांकों पर दबाव बनाए रख सकती है।
- RBI के साथ संबंध: यदि अमेरिकी फेड का रुख सख्त (hawkish) बना रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए घरेलू ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाता है। यदि US द्वारा दरें ऊंची रखने के दौरान RBI दरों में कटौती करता है, तो रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है, जिससे आयात महंगा हो जाएगा और मुद्रास्फीति बढ़ेगी।
आपकी जेब पर प्रभाव
औसत भारतीय परिवार के लिए प्राथमिक चिंता उनकी ईएमआई (EMI) की दिशा है। कई कर्जदार होम लोन और कार लोन की दरों में कमी का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी फेड द्वारा जल्द ही रुख बदलने की संभावना नहीं होने के कारण, उम्मीद है कि RBI सतर्क रुख बनाए रखेगा। इसका मतलब है कि फ्लोटिंग-रेट लोन पर उच्च ब्याज दरें अभी कई और तिमाहियों तक बनी रह सकती हैं।
बाजार का दृष्टिकोण
बाजार विश्लेषकों का सुझाव है कि हालांकि भारत की घरेलू वृद्धि मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक तरलता (liquidity) की कमी निकट अवधि में निफ्टी (Nifty) और सेंसेक्स (Sensex) की बढ़त को सीमित कर सकती है। रियल एस्टेट, बैंकिंग और ऑटो जैसे क्षेत्र जो ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील हैं, उनमें अधिक उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है क्योंकि बाजार 'हायर-फॉर-लॉन्गर' दरों की वास्तविकता के अनुसार खुद को ढाल रहा है।
गोल्डमैन सैक्स ने उल्लेख किया कि मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने की आवश्यकता ही इस देरी के पीछे का मुख्य कारक है। जब तक अमेरिकी फेड कीमतों में गिरावट का स्पष्ट रुझान नहीं देखता, वैश्विक सस्ते पैसे (cheap money) का युग वापस आने की संभावना कम है।
अस्वीकरण: यह सामग्री केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और इसमें कोई वित्तीय सलाह शामिल नहीं है। प्रतिभूति बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है; कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले कृपया प्रमाणित सलाहकार से परामर्श करें।