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अमेरिकी मुद्रास्फीति में कमी: भारत के लिए इसका क्या अर्थ है
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के शुरुआती जुलाई मुद्रास्फीति के आंकड़ों में एक स्वागत योग्य मंदी दिख रही है, लेकिन अंतर्निहित रुझान लगातार मूल्य दबावों का सुझाव देते हैं। यह वैश्विक प्रवृत्ति भारत को प्रभावित करने वाले ब्याज दर निर्णयों और निवेश प्रवाह को प्रभावित कर सकती है।
₹52 लाख के स्तर के करीब संघर्ष कर रहा बिटकॉइन, वैश्विक निवेशक बरत रहे सावधानी
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता और ETF के माध्यम से संस्थागत निवेश में कमी के कारण बिटकॉइन पर दबाव बना हुआ है। हालांकि कीमतों में जून के निचले स्तरों से मामूली सुधार हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नए ट्रिगर्स की कमी के कारण क्रिप्टो बाजार एक 'साइडवेज' (sideways) रुझान में बना हुआ है।
फेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदों से अमेरिकी डॉलर नई ऊंचाइयों पर: भारतीय रुपये के लिए इसके क्या मायने हैं
अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी की संभावना के कारण बढ़ता अमेरिकी डॉलर वैश्विक मुद्राओं पर दबाव डाल रहा है। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए, मजबूत डॉलर का मतलब अक्सर कमजोर रुपया होता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रा, विदेश में शिक्षा और आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।
मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों के बीच अमेरिकी टेक शेयरों की अगुवाई में वॉल स्ट्रीट में तेजी
गुरुवार को प्रमुख अमेरिकी शेयर सूचकांक बढ़त के साथ खुले क्योंकि टेक्नोलॉजी शेयरों में उछाल आया और मध्य पूर्व में संभावित शांति समझौते को लेकर आशावाद बढ़ा। इस सकारात्मक वैश्विक धारणा ने निवेशकों को अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा उच्च ब्याज दरों की चिंताओं को दरकिनार करने में मदद की।
ईरान के साथ तनाव कम होने से अमेरिकी बाजारों में रिकवरी: भारतीय निवेशकों के लिए राहत के संकेत
मध्य पूर्व में व्यापक संघर्ष की आशंकाएं कम होने के साथ अमेरिकी शेयर वायदा (futures) में तेजी आ रही है, जिससे उच्च ब्याज दरों को लेकर जारी चिंताओं का असर कुछ कम हुआ है। यह रिकवरी भारतीय शेयर बाजार और अमेरिकी बाजार में निवेश रखने वाले घरेलू म्यूचुअल फंडों के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
अमेरिकी डॉलर की मजबूती दो महीने के शिखर पर: जानिए क्यों यह रुपये और बाजारों के लिए दबाव का संकेत है
फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की बढ़ती संभावनाओं के बीच अमेरिकी डॉलर दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। भारत के लिए, यह रुझान आयात की लागत बढ़ाने और घरेलू शेयर बाजार में अस्थिरता पैदा करने का खतरा पैदा करता है।
US Fed के फैसले से पहले रुपया डॉलर के मुकाबले 84.52 पर स्थिर
बुधवार को भारतीय रुपया सपाट स्तर पर बंद हुआ। तेल की गिरती कीमतों के कारण मिली शुरुआती बढ़त को आयातकों की भारी डॉलर मांग ने खत्म कर दिया। अब सभी की निगाहें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी नीतिगत फैसले पर हैं, जो विदेशी यात्रा और आयातित वस्तुओं की लागत तय करेगा।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत बदलाव की प्रतीक्षा में अमेरिकी डॉलर कमजोर
अमेरिकी डॉलर में गिरावट देखी जा रही है क्योंकि निवेशक फेडरल रिजर्व के ब्याज दर पर आने वाले निर्णय और भू-राजनीतिक तनाव में संभावित कमी की तैयारी कर रहे हैं। 'ग्रीनबैक' (अमेरिकी डॉलर) में यह नरमी भारतीय रुपये को राहत दे सकती है और भारतीय शेयरों में विदेशी पूंजी को फिर से आकर्षित कर सकती है।
अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी का डर कम होने से सोने की कीमतों में लगातार पांचवें सत्र में उछाल
भू-राजनीतिक स्थिरता और स्थिर ब्याज दरों की उम्मीदों से निवेशकों का भरोसा बढ़ने के कारण सोने की कीमतों में निरंतर वृद्धि जारी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दर वृद्धि पर रोक लगाने की संभावना के बीच, दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाने की ओर देख रहे हैं।
अमेरिकी बाजारों में मिला-जुला रुख: फेड बैठक से पहले टेक शेयरों में गिरावट, जबकि डॉओ जोंस रिकॉर्ड ऊंचाई पर
मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में विभाजित प्रदर्शन देखा गया क्योंकि निवेशकों ने टेक्नोलॉजी शेयरों से हटकर बैंकिंग और औद्योगिक क्षेत्रों का रुख किया। जहां डॉओ जोंस (Dow Jones) ने एक नया सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time high) छुआ, वहीं नैस्डैक (Nasdaq) और S&P 500 फेडरल रिजर्व के ब्याज दर पर आने वाले महत्वपूर्ण फैसले से पहले दबाव में रहे।
वैश्विक राहत: US-Iran समझौते और टेक क्षेत्र में बढ़त से भारतीय बाजारों में तेजी के संकेत
भू-राजनीतिक तनाव में कमी और अमेरिका में सकारात्मक कॉरपोरेट घटनाक्रमों के बाद दलाल स्ट्रीट एक बड़ी शुरुआती तेजी के लिए तैयार है। अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक समझौते ने वैश्विक चिंताओं को शांत कर दिया है, जबकि टेक और मीडिया क्षेत्रों में बड़े सौदों ने रिस्क ऐपेटाइट (जोखिम लेने की क्षमता) को और बढ़ा दिया है।
सोने की कीमतें 6 महीने के निचले स्तर पर: क्या भारतीय निवेशकों के लिए यह खरीदारी का अवसर है?
उच्च अमेरिकी ब्याज दरों के कारण कीमती धातु के आकर्षण में कमी आने से वैश्विक स्तर पर सोने की कीमतें छह महीने से अधिक के निचले स्तर पर आ गई हैं। हालांकि मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है, लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति के दबाव और मजबूत अमेरिकी डॉलर फिलहाल बाजार की चाल तय कर रहे हैं।
वैश्विक तनाव से ब्याज दरों में नई बढ़ोतरी की आशंका के बीच सोने की कीमतों में 3% की गिरावट
यूएस और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण लगातार महंगाई की चिंताओं के चलते सोने की कीमतों में 3% की भारी गिरावट देखी गई। भारतीय खुदरा निवेशक इस पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं क्योंकि फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना टलने से इस कीमती धातु के मूल्य में अस्थिरता पैदा हो गई है।
वैश्विक तनाव बढ़ने से सोने की कीमतों में गिरावट; अस्थिरता के बीच भारतीय खरीदारों के लिए अवसर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतों में उछाल और स्थायी मुद्रास्फीति के डर से सोने की कीमतों में 1% से अधिक की गिरावट आई है। हालांकि कीमतों में यह कमी घरेलू निवेशकों के लिए खरीदारी का अवसर प्रदान करती है, लेकिन अमेरिकी ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी बाजार में और उतार-चढ़ाव पैदा कर सकती है।
अमेरिकी डॉलर दो महीने के उच्चतम स्तर पर: भारतीय निवेशकों और रुपये के लिए इसके क्या हैं मायने
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका में उच्च ब्याज दरों की उम्मीदों के कारण अमेरिकी डॉलर मजबूत हो रहा है। यह रुझान आमतौर पर भारतीय रुपये पर दबाव डालता है और घरेलू शेयर बाजारों में अस्थिरता और ईंधन की कीमतों में वृद्धि का कारण बन सकता है।
अमेरिकी डॉलर दो महीने के उच्चतम स्तर पर: आपकी टेक और यात्रा क्यों हो सकती है महंगी
अमेरिका की मजबूत नौकरियों की रिपोर्ट ने डॉलर को दो महीने के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की आशंका पैदा हो गई है। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए, मजबूत डॉलर का मतलब आमतौर पर कमजोर रुपया होता है, जिससे ईंधन, आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और विदेशी शिक्षा महंगी हो जाती है।
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